Friday, 31 August 2018

मानता ही नहीं कुछ दिल है जो,
बाकी कुछ मनमानियाँ है,
कुछ अपनी मर्जी की है ,
और कुछ हवाओं की बेचैनियाँ है,
जहाँ ले जाए,हवा ये जिंदगी है,
कुछ हमारा हक जिंदगी पे है,
कुछ इसके आगे मेरी बेबसी है,
न जाने क्या असर है मुझपे,
बेखुदी का कि,
कुछ तो खुद को भूलने की जिद्द है,
बाकि कुछ कहानियां है हवाओं कि,
हवा जो..... जिंदगी है,
हर बेखुदी है,
मेरी मुझसे से ही नाराजगी भी है,
और मेरी आवारगी भी है,
मानता ही नहीं कुछ दिल है जो,
और कुछ मनमानियाँ है।
- मनु

Friday, 10 August 2018

यूरोप की आद्योगिक क्रांति ने जहाँ एक तरफ मसिनिकरण को बढ़ावा दिया , वहीं नौकरियाँ भी पैदा की, और एक कामगार या कहे मजदूर ही पर नौकरीपेशा वर्ग भी पैदा किया, कीमते भी कुछ सस्ती हुई और कुछ वस्तुओं की उपलब्धता भी बढ़ी, फिर ऐसा क्या हुआ कि बेरोजगारी और गरीबी का स्तर बढ़ने लगा, सायद उद्योगों पे निर्भरता, क्योंकि जिन वस्तुओं का उत्पादन उद्योगों द्वारा हुआ उनके हस्त-कारीगर बेरोजगार हो गए, क्योंकि मसीन से बने समान हस्त निर्मित वस्तुओं से सस्ते थे,
तो वही वर्ग मजदूर बन गया, और शहर की चकाचौंध वाली जिंदगी की तलाश में एक बड़ा वर्ग शहरों की तरफ आया, अब शहर सबको सम्भाल सकता नहीं था, तो झुग्गियाँ बनी, पर शहर तो फिर भी शहर उसपर अमीरों के असर तो था ही, जरूरत की वस्तुएँ महँगी होती रही।
और मजदूरों के काम के घण्टे भी लंबे होते जिससे वो शारीरिक रूप से भी बीमार हो जाते।
अब बात सोचने की ये है आर्थिक उदारवाद, क्या वास्तव में बेरोजगारी या गरीबी जो कि जीवन स्तर के बुरे होने के मुख्य कारण है, ऐसी समस्या का समाधान है।
मैं सोचता हूँ अगर आप कुछ प्रकाश डाल सके तो समझाइए।

Wednesday, 30 May 2018

जंगलों में भटकते हुए को,
एक सड़क नशीब तो हुई है,
न जाने किस शहर को जाती है,
एक उम्मीद तो नई है,
मंजिल का पता नहीं,
न ये ही पता कि,
किस ओर जाए इस सड़क से
फिर भी वो चला है,
कि कोई भोर तो हुई है,
अँधियारा मन का न कम हुआ,
लेकिन जीने की वजह तो नई है,
मैं जिंदा हूँ, मैं बोलता हूँ,
पत्थरों के शहर में ये शोर तो नई है।
            ------ मनू

Sunday, 13 May 2018

ठंडी राख सी खामोशी फैली है,
बस्तियों में अगर ये सोच कर,
जख्म कुरेदेंगे वो मिट्टी के,
तो अंदर जलती हुई अंगीठी है;
वो आग उगलेगी,
ये जिस्म भी तो आग लिए चुप है,
खुद के ख्वाब लिए गुम है,
जो थकान सी है,
वो राख है,
सीने में मगर जलती आग है,
वो दौड़ता लहू है अंगारा।
ये जिंदगी की जमीन है,
जिसपे हर शख्श बंजारा।
ये आवारगी की आग है,
जबतक जल रही,
सुकून-ऐ-दिल है हर तरफ ,
और हर ग़म है बेचारा,
क्योंकि हम है आवारा।
-  मनु

Monday, 7 May 2018

वो जब भी आएंगे ;
ताकत के गुरूर में,
तो आईने तोड़ेंगे,
अखबार फाड़ेंगें और
किताबे जला देंगे,
वो अपनी अक्ल की मिशाल देंगे;
सिकन्दर से,
बेअक्ल खुद की हिफाज़त में,
नजाने कितने जामिया जला देंगे।
- मनु