जंगलों में भटकते हुए को,
एक सड़क नशीब तो हुई है,
न जाने किस शहर को जाती है,
एक उम्मीद तो नई है,
मंजिल का पता नहीं,
न ये ही पता कि,
किस ओर जाए इस सड़क से
फिर भी वो चला है,
कि कोई भोर तो हुई है,
अँधियारा मन का न कम हुआ,
लेकिन जीने की वजह तो नई है,
मैं जिंदा हूँ, मैं बोलता हूँ,
पत्थरों के शहर में ये शोर तो नई है।
------ मनू
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