Tuesday, 22 September 2015

#मन ना रंगाए ...

राहूल गांधी ने कल एक गंभीर बात कही इस दुनिया में सबके पास माँ है, कोई ऐसा नहीं जिसकी माँ नहीं और मोदीजी हमारी माँ हमसे छीन रहे है।इसपर आगे बैठे काँग्रेसी सोनिया गाँधी की ओर दौड़े, हम आपको कही नही जाने देंगे । राहूल ने कहा अरे ये नहीँ हमारी माता का मतलब जमीन। अब क्या करे कांग्रेसी,# माँ का मतलब उन्हें एक ही पता है। फिर आजकल एक न्यूज़ आई की अचानक से राहूल गाँधी की रैली में भीड़ ज्यादा आने लगी है, उसमें एक आप( AAP) के कार्यकर्ता भी थे हमने पूछा आप यहाँ कैसे , बोले सोमनाथ भारती वाले विषय से टेंशन हो गयी थी और आजकल कपिल शर्मा का शो #cnwk आ नहीं रहा तो यहाँ चले आए ।वैसे आजकल यदि और मनोरंजन चाहिए तो बिहार चुनावों पर होने वाली हिंदी चैनलों की बहस देख ले । अरे जो 5 साल से अपने नेताओं का गुणगान करते रहे अचानक से दूसरी पार्टी में जाकर गलियाने लगते है , लिखा ना हो तो पता नहीं चलता आज किस दल की ओर से आए है नेताजी।
बड़े-बड़े चोर अपनी-अपनी जाति के नेता बन गए है और टोका फसाँकर बिजली चुराने वाले विकास  के दावेदार।मजेदार बात ये है की हर दल समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष तथा न्याय का वकील है, वास्तविकता यह है- #मन ना रंगाए । रंगाए जोगी कपड़ा।
दाढ़ी बढ़ाय जोगी होई गेले बकरा ।

Thursday, 17 September 2015


बड़े बड़े कई देव देखे,
महलों में जो पूजे जाए।
कथा पुरानी कहता जिनकी ,
पंडित आज भी हर घर में जाए।
बड़े प्रसन्न होते तो भैया;
राकस को भी देते वरदान,
आज समाज भी देख रहा है;
आज भी राकस हुए बलवान|
जरूरतमंद मज़दूर बिचारे ;
सड़क किनारे मारे जाए;
बड़े अभागे फिर भी देखो;
प्रभु कृपा ना उनपे आए,
देव सराहे राकस को की,
वाह करम क्या खूब कमाएँ ।
थोडा और तांडव हो तब तो;
देव अवतार ले आए,
कलयुग में तो भगवन भी भैया,
इतनी जल्दी कैसे आए।
पर यदि काम में जल्दी हो तो;
दान पात्र का वज़न बढ़ाएँ।
कलयुग में तो भगवन भी भैया,
इतनी जल्दी कैसे आए।
आज इस ब्लॉग की सुरुआत अपने एक शाम अनुभव से करता हूँ।
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वो मेट्रो ट्रेन में दरवाजे क किनारे बैठा था ,जब मै दाखिल हुआ अंदर ,सो रहा था दारु पी के। मुझे देखा नही गया कि कही कुछ अनहोनी ना हो जाए। मैंने उसे जगाने की कोशिश की जागा नहीं तो उठाने की। उसने मेरा हाथ झटक दिया।फिर कोशिश की तो एक सहयात्री ने कहा,रहने दो ना जब मरना चाहता है मरने दो, मैंने कहा ये तो मर जाएगा पर इंसानियत भी मर जाएगी यही पर, सहयात्री ने फिर सवाल किया अच्छा फिर इतनी अच्छी डील डॉल है इसकी दारु पी के जिंदगी ख़राब कर रहा है, तब इंसानियत नहीं मरी इसकी, सवाल वाजिब था पर मेरे मुह से नजाने क्यों निकला भाई साहब वो लाख बुरा हो पर पता है आस पास सब कुछ होते हुए हमारी जिंदगी क्यों अच्छी नही होती, क्योंकि हम अच्छे इंसान नही होते। इसलिए हमे जब जरुरत हो इंसानियत दिखानी चाहिए , न जाने कब कौन हमारे लिए इंसान बन जाए। खैर उस शराबी को बिठा दिया ऊपर।
हैवान से तो डर के जीती है दुनिया पर जिन्दा है इसी उम्मीद में की इंसानियत अब भी बाकी है।