Wednesday, 30 May 2018

जंगलों में भटकते हुए को,
एक सड़क नशीब तो हुई है,
न जाने किस शहर को जाती है,
एक उम्मीद तो नई है,
मंजिल का पता नहीं,
न ये ही पता कि,
किस ओर जाए इस सड़क से
फिर भी वो चला है,
कि कोई भोर तो हुई है,
अँधियारा मन का न कम हुआ,
लेकिन जीने की वजह तो नई है,
मैं जिंदा हूँ, मैं बोलता हूँ,
पत्थरों के शहर में ये शोर तो नई है।
            ------ मनू

Sunday, 13 May 2018

ठंडी राख सी खामोशी फैली है,
बस्तियों में अगर ये सोच कर,
जख्म कुरेदेंगे वो मिट्टी के,
तो अंदर जलती हुई अंगीठी है;
वो आग उगलेगी,
ये जिस्म भी तो आग लिए चुप है,
खुद के ख्वाब लिए गुम है,
जो थकान सी है,
वो राख है,
सीने में मगर जलती आग है,
वो दौड़ता लहू है अंगारा।
ये जिंदगी की जमीन है,
जिसपे हर शख्श बंजारा।
ये आवारगी की आग है,
जबतक जल रही,
सुकून-ऐ-दिल है हर तरफ ,
और हर ग़म है बेचारा,
क्योंकि हम है आवारा।
-  मनु

Monday, 7 May 2018

वो जब भी आएंगे ;
ताकत के गुरूर में,
तो आईने तोड़ेंगे,
अखबार फाड़ेंगें और
किताबे जला देंगे,
वो अपनी अक्ल की मिशाल देंगे;
सिकन्दर से,
बेअक्ल खुद की हिफाज़त में,
नजाने कितने जामिया जला देंगे।
- मनु