ठंडी राख सी खामोशी फैली है,
बस्तियों में अगर ये सोच कर,
जख्म कुरेदेंगे वो मिट्टी के,
तो अंदर जलती हुई अंगीठी है;
वो आग उगलेगी,
ये जिस्म भी तो आग लिए चुप है,
खुद के ख्वाब लिए गुम है,
जो थकान सी है,
वो राख है,
सीने में मगर जलती आग है,
वो दौड़ता लहू है अंगारा।
ये जिंदगी की जमीन है,
जिसपे हर शख्श बंजारा।
ये आवारगी की आग है,
जबतक जल रही,
सुकून-ऐ-दिल है हर तरफ ,
और हर ग़म है बेचारा,
क्योंकि हम है आवारा।
- मनु
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